श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 107: सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति, साठ हजार सगरपुत्रोंका कपिलकी क्रोधाग्निसे भस्म होना, असमञ्जसका परित्याग, अंशुमान‍्के प्रयत्नसे सगरके यज्ञकी पूर्ति, अंशुमान‍्से दिलीपको और दिलीपसे भगीरथको राज्यकी प्राप्ति  »  श्लोक 58-61
 
 
श्लोक  3.107.58-61 
यज्ञ: समाप्यतां तात सगरस्य महात्मन:।
अंशुमानेवमुक्तस्तु कपिलेन महात्मना॥ ५८॥
आजगाम हयं गृह्य यज्ञवाटं महात्मन:।
सोऽभिवाद्य तत: पादौ सगरस्य महात्मन:॥ ५९॥
मूर्ध्नि तेनाप्युपाघ्रातस्तस्मै सर्वं न्यवेदयत्।
यथा दृष्टं श्रुतं चापि सागराणां क्षयं तथा॥ ६०॥
तं चास्मै हयमाचष्ट यज्ञवाटमुपागतम्।
तच्छ्रुत्वा सगरो राजा पुत्रजं दु:खमत्यजत्॥ ६१॥
 
 
अनुवाद
'पिताजी! महात्मा सगर का यज्ञ पूर्ण कीजिए।' महात्मा कपिल के ऐसा कहने पर अंशुमान उस घोड़े के साथ महामना सगर की यज्ञशाला में आए और उनके चरणों में प्रणाम करके उन्हें सारा समाचार सुनाया। सगर ने भी स्नेह से अंशुमान का सिर सूंघा। अंशुमान ने सगर के पुत्रों के विनाश के विषय में जो कुछ देखा और सुना था, वह सब कह सुनाया। उन्होंने यह भी कहा कि 'यज्ञ का घोड़ा यज्ञशाला में आ गया है।' यह सुनकर राजा सगर ने अपने पुत्रों की मृत्यु का शोक त्याग दिया।
 
'Father! Complete the sacrifice of Mahatma Sagar.' On Mahatma Kapil's saying this, Anshuman came with that horse to the sacrifice hall of Mahamana Sagar and after bowing at his feet told him all the news. Sagar also smelled Anshuman's head with affection. Anshuman told everything that he had seen and heard about the destruction of Sagar's sons. He also said that 'the sacrifice horse has come to the sacrifice hall.' On hearing this, King Sagar gave up the sorrow of the death of his sons.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas