श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 107: सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति, साठ हजार सगरपुत्रोंका कपिलकी क्रोधाग्निसे भस्म होना, असमञ्जसका परित्याग, अंशुमान‍्के प्रयत्नसे सगरके यज्ञकी पूर्ति, अंशुमान‍्से दिलीपको और दिलीपसे भगीरथको राज्यकी प्राप्ति  »  श्लोक 54-55
 
 
श्लोक  3.107.54-55 
तमुवाच महातेजा: कपिलो मुनिपुङ्गव:।
ददानि तव भद्रं ते यद् यत् प्रार्थयसेऽनघ॥ ५४॥
त्वयि क्षमा च धर्मश्च सत्यं चापि प्रतिष्ठितम्।
त्वया कृतार्थ: सगर: पुत्रवांश्च त्वया पिता॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
तब महर्षि कपिल ने अंशुमान से कहा - 'अनघ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम जो कुछ माँगोगे, वह मैं तुम्हें दूँगा। क्षमा, धर्म और सत्य, ये सब तुममें प्रतिष्ठित हैं। राजा सगर तुम्हारे समान पौत्र पाकर कृतज्ञ हैं और तुम्हारे पिता साक्षात तुम्हारे पुत्र हैं। 54-55॥
 
Then the great sage Kapil said to Anshuman – ‘Anagh! May you be well. I will give you whatever you ask for. Forgiveness, righteousness and truth are all revered in you. King Sagar is grateful to have a grandson like you and your father is actually a son to you. 54-55॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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