श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 107: सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति, साठ हजार सगरपुत्रोंका कपिलकी क्रोधाग्निसे भस्म होना, असमञ्जसका परित्याग, अंशुमान‍्के प्रयत्नसे सगरके यज्ञकी पूर्ति, अंशुमान‍्से दिलीपको और दिलीपसे भगीरथको राज्यकी प्राप्ति  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  3.107.52 
तत: प्रीतो महाराज कपिलोंऽशुमतोऽभवत्।
उवाच चैनं धर्मात्मा वरदोऽस्मीति भारत॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
भरतवंशी महाराज! इससे पुण्यात्मा कपिलजी अंशुमान से प्रसन्न होकर बोले - 'मैं आपको वर देने को तैयार हूँ' ॥52॥
 
Bharatvanshi Maharaj! Due to this, the virtuous Kapilji became happy with Anshuman and said – 'I am ready to grant you a boon'. 52॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas