श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 107: सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति, साठ हजार सगरपुत्रोंका कपिलकी क्रोधाग्निसे भस्म होना, असमञ्जसका परित्याग, अंशुमान‍्के प्रयत्नसे सगरके यज्ञकी पूर्ति, अंशुमान‍्से दिलीपको और दिलीपसे भगीरथको राज्यकी प्राप्ति  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  3.107.50 
स तु तेनैव मार्गेण समुद्रं प्रविवेश ह।
अपश्यच्च महात्मानं कपिलं तुरगं च तम्॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
उसी मार्ग से वे समुद्र में प्रविष्ट हुए और महात्मा कपिल तथा यज्ञ के घोड़े को देखा ॥50॥
 
He entered the ocean by the same route and saw Mahatma Kapil and the sacrificial horse. ॥50॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)