श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 107: सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति, साठ हजार सगरपुत्रोंका कपिलकी क्रोधाग्निसे भस्म होना, असमञ्जसका परित्याग, अंशुमान‍्के प्रयत्नसे सगरके यज्ञकी पूर्ति, अंशुमान‍्से दिलीपको और दिलीपसे भगीरथको राज्यकी प्राप्ति  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.107.5 
ते घोरा: क्रूरकर्माण आकाशपरिसर्पिण:।
बहुत्वाच्चावजानन्त:सर्वा ँल्लोकान् सहामरान्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
वे सभी भयंकर स्वभाव और क्रूर कर्म वाले थे। वे आकाश में सभी दिशाओं में विचरण कर सकते थे। अपनी संख्या अधिक होने के कारण वे देवताओं सहित समस्त लोकों की अवहेलना करते थे॥5॥
 
All of them were of fierce nature and cruel deeds. They could roam in all directions in the sky. Due to their large number, they used to disregard all the worlds including the gods.॥ 5॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas