श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 107: सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति, साठ हजार सगरपुत्रोंका कपिलकी क्रोधाग्निसे भस्म होना, असमञ्जसका परित्याग, अंशुमान‍्के प्रयत्नसे सगरके यज्ञकी पूर्ति, अंशुमान‍्से दिलीपको और दिलीपसे भगीरथको राज्यकी प्राप्ति  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  3.107.47 
सगर उवाच
पितुश्च तेऽहं त्यागेन पुत्राणां निधनेन च।
अलाभेन तथाश्वस्य परितप्यामि पुत्रक॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
सगर बोले- बेटा! तुम्हारे पिता द्वारा तुम्हें त्याग देने, अन्य पुत्रों के मर जाने तथा यज्ञ का घोड़ा न मिलने से मैं अत्यन्त दुःखी हो रहा हूँ॥47॥
 
Sagar said- Son! I am feeling completely distressed due to your father abandoning you, death of other sons and not getting the horse for the yagya. 47॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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