श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 107: सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति, साठ हजार सगरपुत्रोंका कपिलकी क्रोधाग्निसे भस्म होना, असमञ्जसका परित्याग, अंशुमान‍्के प्रयत्नसे सगरके यज्ञकी पूर्ति, अंशुमान‍्से दिलीपको और दिलीपसे भगीरथको राज्यकी प्राप्ति  »  श्लोक 42-43
 
 
श्लोक  3.107.42-43 
असमञ्जोभयाद् घोरात् ततो नस्त्रातुमर्हसि।
पौराणां वचनं श्रुत्वा घोरं नृपतिसत्तम:॥ ४२॥
मुहूर्तं विमना भूत्वा सचिवानिदमब्रवीत्।
असमञ्जा: पुरादद्य सुतो मे विप्रवास्यताम्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
अतएव आप हम लोगों की असमंजस के भयंकर भय से रक्षा कीजिए। नगरवासियों के ये भयंकर वचन सुनकर महाबली राजा सगर दो क्षण तक उदास होकर बैठे रहे। फिर उन्होंने मन्त्रियों से कहा - 'आज मेरे पुत्र असमंजस को मेरे घर से निकाल दीजिए।'॥42-43॥
 
‘Therefore, please protect us from the grave fear of Asamanjasa!’ Hearing these dreadful words of the people of the city, the great king Sagara sat dejectedly for two moments. Then he said to the ministers, ‘Today, drive my son Asamanjasa out of my house.’॥ 42-43॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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