| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 107: सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति, साठ हजार सगरपुत्रोंका कपिलकी क्रोधाग्निसे भस्म होना, असमञ्जसका परित्याग, अंशुमान्के प्रयत्नसे सगरके यज्ञकी पूर्ति, अंशुमान्से दिलीपको और दिलीपसे भगीरथको राज्यकी प्राप्ति » श्लोक 39-41 |
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| | | | श्लोक 3.107.39-41  | लोमश उवाच
असमञ्जा इति ख्यात: सगरस्य सुतो ह्यभूत्।
यं शैब्या जनयामास पौराणां स हि दारकान्॥ ३९॥
(क्रीडत: सहसाऽऽसाद्य तत्र तत्र महीपते।)
गलेषु क्रोशतो गृह्य नद्यां चिक्षेप दुर्बलान्।
तत: पौरा: समाजग्मुर्भयशोकपरिप्लुता:॥ ४०॥
सगरं चाभ्यभाषन्त सर्वे प्राञ्जलय: स्थिता:।
त्वं नस्त्राता महाराज परचक्रादिभिर्भयात्॥ ४१॥ | | | | | | अनुवाद | | लोमशजी बोले- हे राजन! रानी शैब्या से उत्पन्न सगर का पुत्र असमंजस नाम से प्रसिद्ध हुआ। वह नगर के दुर्बल बालकों के पास, जो इधर-उधर खेल रहे होते थे, अचानक पहुँच जाता और उनके चीखने-चिल्लाने पर भी उनका गला पकड़कर नदी में फेंक देता। तब भय और शोक में डूबे हुए समस्त नगरवासी राजा सगर के पास आए और हाथ जोड़कर खड़े होकर इस प्रकार कहने लगे- 'महाराज! आप ही शत्रु सेना आदि के भय से हमारी रक्षा करेंगे।' | | | | Lomashji said— O King! The son of Sagara, who was born to Queen Shaibya, became famous by the name of Asamanjasa. He would suddenly reach the weak children of the city, who were playing games here and there, and despite their screaming and shouting, he would grab them by the throat and throw them into the river. Then all the city dwellers, immersed in fear and grief, came to King Sagara and standing with folded hands, started saying thus— 'Maharaj! You are the one who will protect us from the fear of the enemy army etc. | | ✨ ai-generated | | |
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