श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 107: सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति, साठ हजार सगरपुत्रोंका कपिलकी क्रोधाग्निसे भस्म होना, असमञ्जसका परित्याग, अंशुमान‍्के प्रयत्नसे सगरके यज्ञकी पूर्ति, अंशुमान‍्से दिलीपको और दिलीपसे भगीरथको राज्यकी प्राप्ति  »  श्लोक 32-33h
 
 
श्लोक  3.107.32-33h 
वासुदेवेति यं प्राहु: कपिलं मुनिपुङ्गवम्।
स चक्षुर्विकृतं कृत्वा तेजस्तेषु समुत्सृजन्॥ ३२॥
ददाह सुमहातेजा मन्दबुद्धीन् स सागरान्।
 
 
अनुवाद
कपिल मुनि ही भगवान विष्णु हैं, जिन्हें वासुदेव कहा जाता है। उन महान् तेजस्वी भगवान ने अपनी भयंकर आँखें बनाकर उन पर अपना तेज छोड़ा और मंदबुद्धि सगर पुत्रों को भस्म कर दिया।
 
Sage Kapil is the same Lord Vishnu who is called Vasudev. That great and radiant Lord made his eyes fierce and released his brilliance on them and burnt the dull-witted sons of Sagar. 32 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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