श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 107: सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति, साठ हजार सगरपुत्रोंका कपिलकी क्रोधाग्निसे भस्म होना, असमञ्जसका परित्याग, अंशुमान‍्के प्रयत्नसे सगरके यज्ञकी पूर्ति, अंशुमान‍्से दिलीपको और दिलीपसे भगीरथको राज्यकी प्राप्ति  »  श्लोक 30-31
 
 
श्लोक  3.107.30-31 
ते तं दृष्ट्वा हयं राजन् सम्प्रहृष्टतनूरुहा:।
अनादृत्य महात्मानं कपिलं कालचोदिता:॥ ३०॥
संक्रुद्धा: सम्प्रधावन्त अश्वग्रहणकाङ्क्षिण:।
तत: क्रुद्धो महाराज कपिलो मुनिसत्तम:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
महाराज! उस घोड़े को देखते ही उनका शरीर हर्ष और उल्लास से भर गया। काल के वशीभूत और क्रोध में भरकर वे महात्मा कपिल का अपमान करके उस घोड़े को पकड़ने के लिए दौड़े। महाराज! तब महामुनि कपिल क्रोधित हो उठे।
 
King! On seeing that horse, his body was filled with joy and excitement. Driven by time and filled with anger, he ran to catch that horse after insulting Mahatma Kapil. Maharaj! Then the great sage Kapil became furious.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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