| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 107: सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति, साठ हजार सगरपुत्रोंका कपिलकी क्रोधाग्निसे भस्म होना, असमञ्जसका परित्याग, अंशुमान्के प्रयत्नसे सगरके यज्ञकी पूर्ति, अंशुमान्से दिलीपको और दिलीपसे भगीरथको राज्यकी प्राप्ति » श्लोक 28-29 |
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| | | | श्लोक 3.107.28-29  | तत: पूर्वोत्तरे देशे समुद्रस्य महीपते।
विदार्य पातालमथ संक्रुद्धा: सगरात्मजा:॥ २८॥
अपश्यन्त हयं तत्र विचरन्तं महीतले।
कपिलं च महात्मानं तेजोराशिमनुत्तमम्।
तेजसा दीप्यमानं तु ज्वालाभिरिव पावकम्॥ २९॥ | | | | | | अनुवाद | | राजन! तत्पश्चात् क्रोध में भरे हुए सगर के पुत्र पाताल लोक को चीरकर समुद्र के उत्तर-पूर्व क्षेत्र में प्रवेश कर गए और वहाँ उस यज्ञ के घोड़े को पृथ्वी पर विचरण करते देखा। वहाँ तेज के परम स्वरूप महात्मा कपिल विराजमान थे, जो अपने दिव्य तेज से उसी प्रकार प्रज्वलित हो रहे थे, जैसे ज्वालाओं से अग्नि प्रज्वलित होती है। 28-29॥ | | | | Rajan! Thereafter, the sons of Sagar, filled with anger, broke the underworld and entered the north-eastern region of the ocean and there saw that sacrificial horse roaming on the earth. Mahatma Kapil, the supreme embodiment of brilliance, was sitting there, who was emanating from his divine brilliance just like fire from the flames. 28-29॥ | | ✨ ai-generated | | |
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