श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 107: सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति, साठ हजार सगरपुत्रोंका कपिलकी क्रोधाग्निसे भस्म होना, असमञ्जसका परित्याग, अंशुमान‍्के प्रयत्नसे सगरके यज्ञकी पूर्ति, अंशुमान‍्से दिलीपको और दिलीपसे भगीरथको राज्यकी प्राप्ति  »  श्लोक 24-25
 
 
श्लोक  3.107.24-25 
स खन्यमान: सहितै: सागरैर्वरुणालय:।
अगच्छत् परमामार्तिं दीर्यमाण: समन्तत:॥ २४॥
असुरोरगरक्षांसि सत्त्वानि विविधानि च।
आर्तनादमकुर्वन्त वध्यमानानि सागरै:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
जब सगर के पुत्रों ने मिलकर खोदा, तब सब ओर से फटा हुआ समुद्र महान पीड़ा से भर गया। सगर के पुत्रों द्वारा मारे गए दैत्य, सर्प, राक्षस और नाना प्रकार के पशु महान पीड़ा से चिल्लाने लगे॥24-25॥
 
When Sagara's sons dug together, the ocean, torn from all sides, experienced great pain. The demons, serpents, monsters and various kinds of animals, being killed by Sagara's sons, cried out in great pain.॥24-25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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