श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 107: सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति, साठ हजार सगरपुत्रोंका कपिलकी क्रोधाग्निसे भस्म होना, असमञ्जसका परित्याग, अंशुमान‍्के प्रयत्नसे सगरके यज्ञकी पूर्ति, अंशुमान‍्से दिलीपको और दिलीपसे भगीरथको राज्यकी प्राप्ति  »  श्लोक 17-22
 
 
श्लोक  3.107.17-22 
आगम्य पितरं चोचुस्तत: प्राञ्जलयोऽग्रत:।
ससमुद्रवनद्वीपा सनदीनदकन्दरा॥ १७॥
सपर्वतवनोद्देशा निखिलेन मही नृप।
अस्माभिर्विचिता राजञ्छासनात् तव पार्थिव॥ १८॥
न चाश्वमधिगच्छामो नाश्वहर्तारमेव च।
श्रुत्वा तु वचनं तेषां स राजा क्रोधमूर्च्छित:॥ १९॥
उवाच वचनं सर्वांस्तदा दैववशान्नृप।
अनागमाय गच्छध्वं भूयो मार्गत वाजिनम्॥ २०॥
यज्ञियं तं विना ह्यश्वं नागन्तव्यं हि पुत्रका:।
प्रतिगृह्य तु संदेशं पितुस्ते सगरात्मजा:॥ २१॥
भूय एव महीं कृत्स्नां विचेतुमुपचक्रमु:।
अथापश्यन्त ते वीरा: पृथिवीमवदारिताम्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
तब वे अपने पिता के पास आये और हाथ जोड़कर बोले, "महाराज! आपकी आज्ञा से हमने समुद्र, वन, द्वीप, नदी, नाले, गुफा, पर्वत और वन प्रदेशों सहित सम्पूर्ण पृथ्वी की खोज कर ली, किन्तु न तो हम घोड़े को खोज सके और न ही उसे चुराने वाले को।" युधिष्ठिर! यह सुनकर राजा सगर क्रोध से मूर्छित हो गये और उस समय दिव्य शक्ति के प्रभाव से उन्होंने उन सबसे कहा, "जाओ, लौटकर मत आना। घोड़े को पुनः खोजो। पुत्रो! उस यज्ञ का घोड़ा लिये बिना मत लौटना।" पिता का संदेश स्वीकार करके सगर के पुत्र पुनः सम्पूर्ण पृथ्वी पर घोड़े को खोजने लगे। तत्पश्चात उन वीर पुरुषों को एक स्थान पर पृथ्वी में दरार दिखाई दी।
 
Then they came to their father and with folded hands said, "Maharaj! By your order we searched the entire earth including the sea, forest, island, river, stream, cave, mountain and jungle areas, but we could not find the horse nor the one who stole it." Yudhishthira! On hearing this, King Sagar fainted in anger and at that time due to the divine power he said to all of them, "Go, do not return. Find the horse again. Sons! Do not return without taking the horse of that yajna." Accepting the message of their father, Sagar's sons again started searching for the horse on the entire earth. Thereafter those brave men saw a crack in the earth at one place. 17-22.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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