श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 107: सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति, साठ हजार सगरपुत्रोंका कपिलकी क्रोधाग्निसे भस्म होना, असमञ्जसका परित्याग, अंशुमान‍्के प्रयत्नसे सगरके यज्ञकी पूर्ति, अंशुमान‍्से दिलीपको और दिलीपसे भगीरथको राज्यकी प्राप्ति  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  3.107.15-16 
ततस्ते पितुराज्ञाय दिक्षु सर्वासु तं हयम्।
अमार्गन्त महाराज सर्वं च पृथिवीतलम्॥ १५॥
ततस्ते सागरा: सर्वे समुपेत्य परस्परम्।
नाध्यगच्छन्त तुरगमश्वहर्तारमेव च॥ १६॥
 
 
अनुवाद
महाराज! तत्पश्चात् अपने पिता की आज्ञा लेकर वे सम्पूर्ण पृथ्वी पर चारों दिशाओं में घोड़े को खोजने लगे। खोजते-खोजते सगर के सभी पुत्र एक-दूसरे से मिले, किन्तु वे घोड़े और उसे मारने वाले को न पा सके॥ 15-16॥
 
Maharaj! Thereafter taking the permission of his father, he started searching for the horse in all directions on the entire earth. While searching, all the sons of Sagar met each other, but they could not find the horse and the person who killed it.॥ 15-16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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