श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 107: सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति, साठ हजार सगरपुत्रोंका कपिलकी क्रोधाग्निसे भस्म होना, असमञ्जसका परित्याग, अंशुमान‍्के प्रयत्नसे सगरके यज्ञकी पूर्ति, अंशुमान‍्से दिलीपको और दिलीपसे भगीरथको राज्यकी प्राप्ति  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.107.10 
एवमुक्तास्तु ते देवा लोकाश्च मनुजेश्वर।
पितामहमनुज्ञाप्य विप्रजग्मुर्यथागतम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों! उनके ऐसा कहने पर समस्त देवता आदि लोग ब्रह्माजी की अनुमति लेकर जिस मार्ग से आए थे, उसी मार्ग से लौट गए॥10॥
 
O lord of men! Upon his saying this, all the gods and other people took Brahmaji's permission and returned the way they had come.॥ 10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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