श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 107: सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति, साठ हजार सगरपुत्रोंका कपिलकी क्रोधाग्निसे भस्म होना, असमञ्जसका परित्याग, अंशुमान‍्के प्रयत्नसे सगरके यज्ञकी पूर्ति, अंशुमान‍्से दिलीपको और दिलीपसे भगीरथको राज्यकी प्राप्ति  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.107.1 
लोमश उवाच
एतच्छ्रुत्वान्तरिक्षाच्च स राजा राजसत्तम:।
यथोक्तं तच्चकाराथ श्रद्दधद् भरतर्षभ॥ १॥
 
 
अनुवाद
लोमशजी कहते हैं - हे भरतश्रेष्ठ! इस दिव्य वाणी को सुनकर राजाओं में श्रेष्ठ राजा सगर ने उस पर विश्वास किया और उसके कहे अनुसार ही सब कुछ किया॥1॥
 
Lomashaji says - O best of the Bharatas! On hearing this heavenly voice, the king Sagar, the most eminent among the kings, believed in it and did everything as per its instructions.॥ 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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