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mahabharat 3.105.11: सोने के सिक्कों की मालाओं से सुसज्जित, कुण्डल और बाजूबंद पहने हुए वे राक्षस वहाँ मारे जाने पर पुष्पित पलाश वृक्षों के समान अधिक शोभायमान हो रहे थे। 11.   |   mahabharat अध्याय 3.105: अगस्त्यजीके द्वारा समुद्रपान और देवताओंका कालेय दैत्योंका वध करके ब्रह्माजीसे समुद्रको पुन: भरनेका उपाय पूछना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 105: अगस्त्यजीके द्वारा समुद्रपान और देवताओंका कालेय दैत्योंका वध करके ब्रह्माजीसे समुद्रको पुन: भरनेका उपाय पूछना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  3.105.11 
ते हेमनिष्काभरणा: कुण्डलाङ्गदधारिण:।
निहता बह्वशोभन्त पुष्पिता इव किंशुका:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
सोने के सिक्कों की मालाओं से सुसज्जित, कुण्डल और बाजूबंद पहने हुए वे राक्षस वहाँ मारे जाने पर पुष्पित पलाश वृक्षों के समान अधिक शोभायमान हो रहे थे। 11.
 
The demons adorned with garlands of gold coins and wearing earrings and armlets, after being killed there, looked more beautiful like the blooming Palaash trees. 11.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)