| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 101: वृत्रासुरका वध और असुरोंकी भयंकर मन्त्रणा » श्लोक 20-23 |
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| | | | श्लोक 3.101.20-23  | तेषां तु तत्र क्रमकालयोगाद्
घोरा मतिश्चिन्तयतां बभूव।
ये सन्ति विद्यातपसोपपन्ना-
स्तेषां विनाश: प्रथमं तु कार्य:॥ २०॥
लोका हि सर्वे तपसा ध्रियन्ते
तस्मात् त्वरध्वं तपस: क्षयाय।
ये सन्ति केचिच्च वसुंधरायां
तपस्विनो धर्मविदश्च तज्ज्ञा:॥ २१॥
तेषां वध: क्रियतां क्षिप्रमेव
तेषु प्रणष्टेषु जगत् प्रणष्टम्।
एवं हि सर्वे गतबुद्धिभावा
जगद्विनाशे परमप्रहृष्टा:॥ २२॥
दुर्गं समाश्रित्य महोर्मिमन्तं
रत्नाकरं वरुणस्यालयं स्म॥ २३॥ | | | | | | अनुवाद | | वहाँ बहुत समय तक विचार करने के बाद उन दैत्यों ने यह निश्चय किया कि सबसे पहले विद्वान और तपस्वी लोगों का नाश करना चाहिए। सभी लोग तपस्या के बल पर ही जीवित हैं। अतः तुम सब लोग शीघ्रता से तपस्या का नाश करने का कार्य करो। पृथ्वी पर जितने भी तपस्वी, धार्मिक विद्वान और उन्हें जानने तथा उनका आदर करने वाले लोग हैं, उनका तत्काल संहार कर दो। यदि इनका नाश हो गया, तो समस्त जगत् का नाश हो जाएगा। इस प्रकार बुद्धि और विचार से शून्य वे सभी दैत्य जगत् के नाश की बात सोचकर अत्यंत प्रसन्न होने लगे। वे वरुण के निवास रत्नाकर सागर के दुर्ग में, जो प्रचण्ड तरंगों से भरा हुआ था, आश्रय लेकर निर्भय होकर वहाँ रहने लगे। | | | | There, after contemplating for a long time, those demons decided that the learned and ascetic people should be destroyed first. All the people are surviving only because of penance. Therefore, all of you should act quickly to destroy penance. Kill immediately all the ascetics, religious scholars and people who know and respect them on the earth. If they are destroyed, the whole world will be destroyed. Thus, all those demons, devoid of wisdom and thought, started feeling very happy thinking about the destruction of the world. Taking shelter in the fort of Ratnakar ocean, the abode of Varuna, filled with turbulent waves, they started living there fearlessly. | | | इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां वृत्रवधोपाख्याने एकाधिकशततमोऽध्याय:॥ १०१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें वृत्रवधोपाख्यानविषयक एक सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०१॥
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