श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 89: धृतराष्ट्रकी चिन्ता और उनका संजयके साथ वार्तालाप  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.89.5 
संजय उवाच
तवेदं स्वकृतं राजन् महद् वैरमुपस्थितम्।
विनाशो येन लोकस्य सानुबन्धो भविष्यति॥ ५॥
 
 
अनुवाद
संजय ने कहा, 'हे राजन! यह आपके ही कर्म का परिणाम है, जिसके कारण यह महान् शत्रुता उत्पन्न हुई है और इसके कारण समस्त जगत् अपने बन्धुओं सहित नष्ट हो जायेगा।
 
Sanjaya said, 'O King! It is your own deed that has led to this great enmity and because of this the whole world will be destroyed along with its relatives.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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