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mahabharat 2.88.41: ‘जब वह वन में पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करके क्रोध और क्षोभ से व्याकुल होकर यहाँ लौटेगा, तब वह अवश्य ही बदला लेगा। उसका बदला हम लोगों के लिए महान दुःख का कारण होगा॥ 41॥   |   mahabharat अध्याय 2.88: वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 88: वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  2.88.41 
चरितब्रह्मचर्याश्च क्रोधामर्षवशानुगा:।
वैरं निर्यातयिष्यन्ति महद् दु:खाय पाण्डवा:॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
‘जब वह वन में पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करके क्रोध और क्षोभ से व्याकुल होकर यहाँ लौटेगा, तब वह अवश्य ही बदला लेगा। उसका बदला हम लोगों के लिए महान दुःख का कारण होगा॥ 41॥
 
‘When he returns here after observing complete celibacy in the forest, overcome by anger and resentment, he will certainly take revenge. His revenge will be the cause of great sorrow for us.॥ 41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)