श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 87: द्रौपदीका कुन्तीसे विदा लेना तथा कुन्तीका विलाप एवं नगरके नर-नारियोंका शोकातुर होना  »  श्लोक d9-d10
 
 
श्लोक  2.87.d9-d10 
अद्य नूनं पृथा देवी सत्त्वमाविश्य भाषते॥
पुत्रान् स्नुषां च देवी तु द्रष्टुमद्याथ नार्हति॥
 
 
अनुवाद
निश्चय ही आज कुन्तीदेवी अपने पुत्रों और बहुओं से बड़े धैर्य से बात करती हैं, अन्यथा इस अवस्था में तो वे उनकी ओर देख भी नहीं सकतीं।
 
Certainly today Kuntidevi talks to her sons and daughters-in-law with great patience; otherwise in this condition she cannot even look at them.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)