vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 2: सभा पर्व
»
अध्याय 87: द्रौपदीका कुन्तीसे विदा लेना तथा कुन्तीका विलाप एवं नगरके नर-नारियोंका शोकातुर होना
»
श्लोक d17
श्लोक
2.87.d17
उद्यानानि परित्यज्य क्षेत्राणि च गृहाणि च।
एकदु:खसुखा: पार्थमनुयाम सुधार्मिकम्॥
अनुवाद
आज हम अपने खेत, बाग और घर छोड़कर परम धर्मात्मा कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर के साथ चलें और उनके सुख-दुःख को अपना सुख-दुःख समझें।
Today let us leave our farms, orchards and homes and go with the most virtuous Kunti's son Yudhishthir and consider his joys and sorrows as our own.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×