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mahabharat 2.84.17: पार्षद बोले - हाय रे! ये भाई भी युधिष्ठिर को उस महान भय के विषय में नहीं बताते जो उन पर आने वाला है। मैं नहीं जानता कि भारत के ये महान युधिष्ठिर अपनी बुद्धि से इस भय को समझेंगे या नहीं। 17॥   |   mahabharat अध्याय 2.84: सबके मना करनेपर भी धृतराष्ट्रकी आज्ञासे युधिष्ठिरका पुन: जूआ खेलना और हारना   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 84: सबके मना करनेपर भी धृतराष्ट्रकी आज्ञासे युधिष्ठिरका पुन: जूआ खेलना और हारना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.84.17 
सभ्या ऊचु:
अहो धिग् बान्धवा नैनं बोधयन्ति महद् भयम्।
बुद्धॺा बुध्येन्न वा बुध्येदयं वै भरतर्षभ:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
पार्षद बोले - हाय रे! ये भाई भी युधिष्ठिर को उस महान भय के विषय में नहीं बताते जो उन पर आने वाला है। मैं नहीं जानता कि भारत के ये महान युधिष्ठिर अपनी बुद्धि से इस भय को समझेंगे या नहीं। 17॥
 
The councilor said – Oh shame! These brothers also do not explain to Yudhishthira about the great fear that will befall them. I don't know whether this great Yudhishthir of India will understand this fear with his intelligence or not. 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)