श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 82: दुर्योधनका धृतराष्ट्रसे अर्जुनकी वीरता बतलाकर पुन: द्यूतक्रीड़ाके लिये पाण्डवोंको बुलानेका अनुरोध और उनकी स्वीकृति  »  श्लोक d57
 
 
श्लोक  2.82.d57 
पार्थमेव हि पश्यामि रहिते तात भारत।
दृष्ट्वा स्वप्नगतं पार्थमुद्‍भ्रमामि ह्यचेतन:॥
 
 
अनुवाद
भारत! मुझे एकांत में केवल अर्जुन ही दिखाई देता है। स्वप्न में भी अर्जुन को देखकर मैं अचेत और भ्रमित हो जाता हूँ।
 
Bharat! I see only Arjuna in solitude. Even in my dreams I become unconscious and confused on seeing Arjuna.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)