श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 8: यमराजकी सभाका वर्णन  »  श्लोक 29-32
 
 
श्लोक  2.8.29-32 
अगस्त्योऽथ मतङ्गश्च कालो मृत्युस्तथैव च।
यज्वानश्चैव सिद्धाश्च ये च योगशरीरिण:॥ २९॥
अग्निष्वात्ताश्च पितर: फेनपाश्चोष्मपाश्च ये।
स्वधावन्तो बर्हिषदो मूर्तिमन्तस्तथापरे॥ ३०॥
कालचक्रं च साक्षाच्च भगवान् हव्यवाहन:।
नरा दुष्कृतकर्माणो दक्षिणायनमृत्यव:॥ ३१॥
कालस्य नयने युक्ता यमस्य पुरुषाश्च ये।
तस्यां शिंशपपालाशास्तथा काशकुशादय:।
उपासते धर्मराजं मूर्तिमन्तो जनाधिप॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
अगस्त्य, मातंग, काल, मृत्यु, यज्ञकर्ता, सिद्ध, योगशरीरधारी पितर, अग्निश्वत पितर, फेनाप, उष्मप, स्वधावन, बर्हिषद तथा अन्य मूर्तिमान पितर, साक्षात कालचक्र (संवत्सर आदि कालविभाग के अभिमानी देवता), भगवान हव्यवाहन (अग्नि), दक्षिणायन में मरने वाले तथा सिद्धि प्राप्ति की इच्छा से कठिन (श्रमसाध्य) कर्म करने वाले मनुष्य, जनेश्वर काल्कि, आज्ञा पालन में तत्पर यमदूत, शिंशप और पलाश के अभिमानी देवता, काश और कुश आदि मूर्तिरूप धारण करके उस सभा में धर्मराज की पूजा करते हैं।।29-32॥
 
Agastya, Matang, Kaal, Death, Yagya performer, Siddha, Yoga-bodied ancestors, Agnishvat ancestors, Fenap, Ushmap, Swadhavan, Barhishad and other idol ancestors, Sakshat Kalachakra (arrogant deity of Samvatsara etc. time division), Lord Havyavahana (Agni), people who die in Dakshinayan and do difficult (laborious) deeds with the intention of achieving success, Janeshwar Kaalki. Yamdoots, ready to obey orders, the proud gods of Shinshap and Palash, Kash and Kush, etc., take the form of idols and worship Dharmaraja in that assembly. 29-32॥
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