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mahabharat 2.77.6: पहले जब पांडव अपने महल में रहते थे, तो वे हवा का स्पर्श भी सहन नहीं कर पाते थे, लेकिन अब यह दुष्ट आत्मा दु:शासन की भरी सभा में मुझ द्रौपदी को स्पर्श कर रही है। फिर भी आज ये पांडुपुत्र इसे सहन कर रहे हैं।   |   mahabharat अध्याय 2.77: द्रौपदीका चेतावनीयुक्त विलाप एवं भीष्मका वचन   ।   mahabharat पर्व 2: सभा पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 77: द्रौपदीका चेतावनीयुक्त विलाप एवं भीष्मका वचन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.77.6 
यां न मृष्यन्ति वातेन स्पृश्यमानां गृहे पुरा।
स्पृश्यमानां सहन्तेऽद्य पाण्डवास्तां दुरात्मना॥ ६॥
 
 
अनुवाद
पहले जब पांडव अपने महल में रहते थे, तो वे हवा का स्पर्श भी सहन नहीं कर पाते थे, लेकिन अब यह दुष्ट आत्मा दु:शासन की भरी सभा में मुझ द्रौपदी को स्पर्श कर रही है। फिर भी आज ये पांडुपुत्र इसे सहन कर रहे हैं।
 
Earlier when the Pandavas were living in their palace they could not even tolerate the touch of wind, but now this evil soul is touching me, Draupadi, in the assembly full of Dushasan. Even then today these sons of Pandu are tolerating it.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)