श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 76: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक d4-d5h
 
 
श्लोक  2.76.d4-d5h 
वैशम्पायन उवाच
गोविन्देति समाभाष्य कृष्णेति च पुन: पुन:।
मनसा चिन्तयामास देवं नारायणं प्रभुम्॥
आपत्स्वभयदं कृष्णं लोकानां प्रपितामहम्।)
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं, 'हे जनमेजय!' ऐसा सोचकर द्रौपदी बार-बार 'गोविन्द' और 'कृष्ण' का नाम लेती रहीं और मन ही मन संसार के पितामह भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करती रहीं, जो संकट के समय रक्षा करते हैं।
 
Vaishmpayana says, 'O Janamejaya! Thinking thus, Draupadi repeatedly called out the names of 'Govind' and 'Krishna' and thought in her mind of Lord Krishna, the great grandfather of the world, who gives protection in times of trouble.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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