|
| |
| |
श्लोक 2.76.90  |
तां वेपमानां सव्रीडां प्रलपन्तीं स्म पाण्डवान्।
दु:शासन: सभामध्ये विचकर्ष तपस्विनीम्॥ ९०॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| द्रौपदी लज्जा से काँप रही थी और पाण्डवों को पुकार रही थी। उस अवस्था में दु:शासन उस दीन, दुःखी तपस्विनी को भरी सभा में घसीटने लगा॥90॥ |
| |
| Draupadi was trembling in shame and calling out for the Pandavas. In that state, Dushasan began to drag that poor, distressed ascetic woman in the midst of the crowded assembly.॥90॥ |
| |
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि द्रौपद्याकर्षणेऽष्टषष्टितमोऽध्याय:॥ ६८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें ‘द्रौपदीको भरी सभामें खींचना’ इस विषयसे सम्बन्ध रखनेवाला अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६८॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ९४ १/२ श्लोक हैं) |
| |
| ✨ ai-generated |
| |
|