श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 76: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 89
 
 
श्लोक  2.76.89 
वैशम्पायन उवाच
विदुरस्य वच: श्रुत्वा नोचु: किंचन पार्थिवा:।
कर्णो दु:शासनं त्वाह कृष्णां दासीं गृहान् नय॥ ८९॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! विदुरजी के ये वचन सुनकर भी सब राजा कुछ नहीं बोले। उस समय कर्ण ने दु:शासन से कहा- 'इस दासी द्रौपदी को अपने घर ले जाओ'॥89॥
 
Vaishampayana says- Janamejaya! Even after hearing these words of Vidura, all the kings did not say anything. At that time Karna said to Dushasan- 'Take this maid Draupadi to your house'॥ 89॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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