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श्लोक 2.76.88  |
विदुर उवाच
एवं वै परमं धर्मं श्रुत्वा सर्वे सभासद:।
यथाप्रश्नं तु कृष्णाया मन्यध्वं तत्र किं परम्॥ ८८॥ |
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| अनुवाद |
| विदुर जी बोले - हे मित्रो सभा! इस उत्तम धार्मिक प्रसंग को सुनकर आप सब लोग द्रौपदी के प्रश्नानुसार इस विषय में अपनी क्या राय है, यह बताने की कृपा करें ॥ 88॥ |
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| Vidur ji said - Friends in the assembly! After listening to this excellent religious episode, all of you please tell us as per Draupadi's question, what is your opinion regarding it? ॥ 88॥ |
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