श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 76: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 88
 
 
श्लोक  2.76.88 
विदुर उवाच
एवं वै परमं धर्मं श्रुत्वा सर्वे सभासद:।
यथाप्रश्नं तु कृष्णाया मन्यध्वं तत्र किं परम्॥ ८८॥
 
 
अनुवाद
विदुर जी बोले - हे मित्रो सभा! इस उत्तम धार्मिक प्रसंग को सुनकर आप सब लोग द्रौपदी के प्रश्नानुसार इस विषय में अपनी क्या राय है, यह बताने की कृपा करें ॥ 88॥
 
Vidur ji said - Friends in the assembly! After listening to this excellent religious episode, all of you please tell us as per Draupadi's question, what is your opinion regarding it? ॥ 88॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas