श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 76: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 86
 
 
श्लोक  2.76.86 
श्रेयान् सुधन्वा त्वत्तो वै मत्त: श्रेयांस्तथाङ्गिरा:।
माता सुधन्वनश्चापि मातृत: श्रेयसी तव।
विरोचन सुधन्वायं प्राणानामीश्वरस्तव॥ ८६॥
 
 
अनुवाद
'विरोचन! सुधन्वा तुमसे श्रेष्ठ है, उसके पिता अंगिरा मुझसे श्रेष्ठ हैं और सुधन्वा की माता तुम्हारी माता से श्रेष्ठ है। अब यही सुधन्वा तुम्हारे प्राणों का स्वामी है।'॥86॥
 
'Virochan! Sudhanva is superior to you, his father Angira is superior to me and Sudhanva's mother is superior to your mother. Now this Sudhanva is the master of your life.'॥ 86॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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