श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 76: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  2.76.85 
कश्यपस्य वच: श्रुत्वा प्रह्लाद: पुत्रमब्रवीत्॥ ८५॥
 
 
अनुवाद
कश्यपजी के ये वचन सुनकर प्रह्लादजी ने अपने पुत्र से कहा-॥85॥
 
Hearing these words from Kasyapa, Prahlada said to his son -॥ 85॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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