श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 76: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 78
 
 
श्लोक  2.76.78 
अर्धं हरति वै श्रेष्ठ: पादो भवति कर्तृषु।
पादश्चैव सभासत्सु ये न निन्दन्ति निन्दितम्॥ ७८॥
 
 
अनुवाद
यदि सभा में कोई गलत कार्य होता है तो उसका आधा भाग सभापति स्वयं लेता है, एक चौथाई उन लोगों को जाता है जो गलत कार्य करते हैं और एक चौथाई उन सदस्यों को जाता है जो आलोचना योग्य व्यक्ति की आलोचना नहीं करते हैं।
 
If any wrong is done in the assembly, half of it is taken by the chairman himself, one fourth goes to those who do it and one fourth goes to those members who do not criticise the criticisable person. 78.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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