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श्लोक 2.76.71  |
सुधन्वना तथोक्त: सन् व्यथितोऽश्वत्थपर्णवत्।
जगाम कश्यपं दैत्य: परिप्रष्टुं महौजसम्॥ ७१॥ |
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| अनुवाद |
| सुधन्वा की यह बात सुनकर प्रह्लाद व्याकुल हो गया और पीपल के पत्ते की तरह काँपने लगा। इस विषय में कुछ पूछने के लिए वह महाबली कश्यप के पास गया। |
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| On hearing Sudhanva say this, Prahlada became distressed and began to tremble like a peepal leaf. To ask something about this he went to the mighty Kasyapa. |
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