श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 76: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  2.76.64 
य: पुनर्वितथं ब्रूयाद् धर्मदर्शी सभां गत:।
अनृतस्य फलं कृत्स्नं सम्प्राप्नोतीति निश्चय:॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार जो मनुष्य धर्म को जानकर सभा में जाकर किसी प्रश्न पर मिथ्या निर्णय देता है, वह झूठ बोलने का पूरा फल (दण्ड) अवश्य ही भोगता है ॥ 64॥
 
Similarly a person who, having knowledge of Dharma, goes to a gathering and gives a false judgment on any question, certainly receives the full result (punishment) of speaking a lie. ॥ 64॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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