श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 76: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  2.76.56 
धिक्शब्दस्तु ततस्तत्र समभूल्लोमहर्षण:।
सभ्यानां नरदेवानां दृष्ट्वा कुन्तीसुतांस्तथा॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
उस समय कुन्तीपुत्रों की ओर देखकर सभा में उपस्थित राजागण रोमांचकारी शब्दों में दु:शासन को शाप देने लगे।
 
At that time, looking at the sons of Kunti, the kings present in the assembly began to shower curses upon Dushasan in thrilling words. 56.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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