श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 76: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  2.76.54 
वैशम्पायन उवाच
तस्य ते तद् वच: श्रुत्वा रौद्रं लोमप्रहर्षणम्।
प्रचक्रुर्बहुलां पूजां कुत्सन्तो धृतराष्ट्रजम्॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! भीमसेन का यह भयंकर और रोंगटे खड़े कर देने वाला वचन सुनकर वहाँ बैठे हुए राजाओं ने धृतराष्ट्रपुत्र दु:शासन की निन्दा की और भीमसेन की बहुत प्रशंसा की।
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! On hearing this terrifying and hair-raising statement of Bhimasena, the kings sitting there denounced Dhritarashtra's son Dushasan and praised Bhimasena profusely.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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