श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 76: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.76.5 
एषा ह्यनर्हती बाला पाण्डवान् प्राप्य कौरवै:।
त्वत्कृते क्लिश्यते क्षुद्रैर्नृशंसैरकृतात्मभि:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
पाण्डवों को पतिरूप में पाकर यह निरपराध और अबला स्त्री इस प्रकार अपमानित होने की अधिकारी नहीं थी, परन्तु तुम्हारे कारण ये नीच, क्रूर और अजेय कौरव इस पर नाना प्रकार के कष्ट डाल रहे हैं॥5॥
 
This innocent and helpless woman did not deserve to be insulted in this manner after having the Pandavas as her husbands, but because of you these vile, cruel and unconquerable Kauravas are inflicting various kinds of troubles on her. ॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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