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श्लोक 2.76.47  |
आकृष्यमाणे वसने द्रौपद्यास्तु विशाम्पते।
तद्रूपमपरं वस्त्रं प्रादुरासीदनेकश:॥ ४७॥ |
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| अनुवाद |
| हे जनमेजय! जैसे-जैसे द्रौपदी के वस्त्र खींचे जाने लगे, वैसे-वैसे बहुत-से वस्त्र प्रकट होने लगे ॥47॥ |
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| O Janamejaya! As Draupadi's clothes were being pulled, many similar clothes began to appear. ॥ 47॥ |
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