श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 76: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  2.76.47 
आकृष्यमाणे वसने द्रौपद्यास्तु विशाम्पते।
तद्रूपमपरं वस्त्रं प्रादुरासीदनेकश:॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
हे जनमेजय! जैसे-जैसे द्रौपदी के वस्त्र खींचे जाने लगे, वैसे-वैसे बहुत-से वस्त्र प्रकट होने लगे ॥47॥
 
O Janamejaya! As Draupadi's clothes were being pulled, many similar clothes began to appear. ॥ 47॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas