श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 76: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  2.76.44 
इत्यनुस्मृत्य कृष्णं सा हरिं त्रिभुवनेश्वरम्।
प्रारुदद् दु:खिता राजन् मुखमाच्छाद्य भामिनी॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! तीनों लोकों के स्वामी भगवान श्रीकृष्ण का बार-बार स्मरण करके अभिमानी द्रौपदी दुःखी हो गई और अपना मुख पल्लू से ढँककर जोर-जोर से रोने लगी।
 
King! Thinking repeatedly about Lord Krishna, the lord of the three worlds, the proud Draupadi became sad and started crying loudly, covering her face with her pallu.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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