श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 76: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 41-42
 
 
श्लोक  2.76.41-42 
गोविन्द द्वारकावासिन् कृष्ण गोपीजनप्रिय॥ ४१॥
कौरवै: परिभूतां मां किं न जानासि केशव।
हे नाथ हे रमानाथ व्रजनाथार्तिनाशन।
कौरवार्णवमग्नां मामुद्धरस्व जनार्दन॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
हे गोविन्द! हे द्वारकावासी श्रीकृष्ण! हे गोपिकाओं के प्रिय केशव! कौरव मेरा अपमान कर रहे हैं, क्या आप नहीं जानते? हे नाथ! हे रामनाथ! हे व्रजनाथ! हे संकटनाशक जनार्दन! मैं कौरवों के सागर में डूब रहा हूँ, कृपया मेरा उद्धार कीजिए॥ 41-42॥
 
'O Govind! O Dwarkadweller Sri Krishna! O Keshav, the beloved of the gopikas! The Kauravas are insulting me, don't you know? O Nath! O Ramanath! O Vrajnath! O Janardan, the destroyer of troubles! I am drowning in the ocean of Kauravas, please save me.॥ 41-42॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas