श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 76: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  2.76.4 
न च मे तत्र कोपोऽभूत् सर्वस्येशो हि नो भवान्।
इमं त्वतिक्रमं मन्ये द्रौपदी यत्र पण्यते॥ ४॥
 
 
अनुवाद
परन्तु मैं इस बात पर क्रोधित नहीं हूँ, क्योंकि जो कुछ हमारे पास है, उसके स्वामी आप ही हैं। परन्तु मैं यह बहुत अनुचित समझता हूँ कि द्रौपदी को दांव पर लगाया गया।॥4॥
 
But I am not angry for this, because you are the master of all that we have. But I consider it very unfair that Draupadi was put at stake. ॥ 4॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas