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श्लोक 2.76.35-36  |
एको भर्ता स्त्रिया देवैर्विहित: कुरुनन्दन।
इयं त्वनेकवशगा बन्धकीति विनिश्चिता॥ ३५॥
अस्या: सभामानयनं न चित्रमिति मे मति:।
एकाम्बरधरत्वं वाप्यथ वापि विवस्त्रता॥ ३६॥ |
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| अनुवाद |
| हे कुरुपुत्र! देवताओं ने तो यह विधान किया है कि स्त्री का एक ही पति होना चाहिए; परन्तु यह द्रौपदी अनेक पतियों के वश में है, अतः यह निश्चय ही वेश्या है। इसका राजसभा में लाया जाना कोई असामान्य बात नहीं है। यदि यह एक ही वस्त्र पहने हो अथवा नग्न हो, तब भी इसे यहाँ लाया जा सकता है, यह मेरा स्पष्ट मत है ॥35-36॥ |
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| O son of Kuru! The gods have ordained that a woman should have only one husband; but this Draupadi is under the control of many husbands, hence she is definitely a prostitute. Her being brought to the court is not unusual. She can be brought here even if she is wearing only one garment or is naked, this is my clear opinion. ॥ 35-36॥ |
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