श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 76: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.76.32 
अभ्यन्तरा च सर्वस्वे द्रौपदी भरतर्षभ।
एवं धर्मजितां कृष्णां मन्यसे न जितां कथम्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! द्रौपदी भी तो सर्व के भीतर है। जब कृष्ण को धर्मपूर्वक जीत लिया गया है, तो तुम उसे क्यों नहीं जीतते?॥ 32॥
 
O best of the Bharatas! Draupadi is also within the All. When Krishna has been conquered in a righteous manner, why do you consider her not conquered?॥ 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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