श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 76: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  2.76.31 
कथं ह्यविजितां कृष्णां मन्यसे धृतराष्ट्रज।
यदा सभायां सर्वस्वं न्यस्तवान् पाण्डवाग्रज:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
हे धृतराष्ट्रपुत्र! तुम यह कैसे कह सकते हो कि कृष्ण नहीं जीते, जबकि पाण्डवों के बड़े भाई युधिष्ठिर ने अपना सम्पूर्ण धन जुए के मैदान में दांव पर लगा दिया है?
 
O son of Dhritarashtra, how can you say that Krishna has not won, when Yudhishthira, the elder brother of the Pandavas, has put his entire fortune at stake in the gambling hall?
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas