श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 76: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  2.76.27 
कर्ण उवाच
दृश्यन्ते वै विकर्णेह वैकृतानि बहून्यपि।
तज्जातस्तद्विनाशाय यथाग्निररणिप्रज:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
कर्ण ने कहा - विकर्ण ! इस संसार में अनेक वस्तुएँ विपरीत परिणाम उत्पन्न करने वाली देखी जाती हैं। जैसे अग्नि से उत्पन्न अग्नि उसी अग्नि को जला देती है, उसी प्रकार कुछ लोग जिस कुल में जन्म लेते हैं, उसी कुल का नाश करने वाले हो जाते हैं॥ 27॥
 
Karna said - Vikarna! In this world many things are seen to produce opposite results. Just as the fire produced from the fire burns the same fire, similarly some people become the destroyers of the family in which they are born.॥ 27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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