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श्लोक 2.76.22  |
तदयं पाण्डुपुत्रेण व्यसने वर्तता भृशम्।
समाहूतेन कितवैरास्थितो द्रौपदीपण:॥ २२॥ |
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| अनुवाद |
| 'ये पाण्डु नन्दन युधिष्ठिर पापकर्म में अत्यन्त लिप्त हैं। धूर्त जुआरियों के कहने से प्रेरित होकर इन्होंने द्रौपदी को दांव पर लगा दिया है। 22॥ |
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| 'This Pandu Nandan Yudhishthir is very much engrossed in the vice of evil. Inspired by cunning gamblers, he has put Draupadi at stake. 22॥ |
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