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श्लोक 2.76.21  |
एतेषु हि नर: सक्तो धर्ममुत्सृज्य वर्तते।
यथायुक्तेन च कृतां क्रियां लोको न मन्यते॥ २१॥ |
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| अनुवाद |
| इन विकारों में आसक्त मनुष्य मनमाना आचरण करने लगता है और धर्म की अवहेलना करता है। ऐसे विकारों में आसक्त मनुष्य के किसी भी कार्य का लोग आदर नहीं करते।॥21॥ |
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| ‘A person addicted to these vices starts behaving arbitrarily and disregards Dharma. People do not respect any work done by such a person addicted to vices.॥ 21॥ |
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