| श्री महाभारत » पर्व 2: सभा पर्व » अध्याय 76: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना » श्लोक 2-3 |
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| | | | श्लोक 2.76.2-3  | काश्यो यद् धनमाहार्षीद् द्रव्यं यच्चान्यदुत्तमम्।
तथान्ये पृथिवीपाला यानि रत्नान्युपाहरन्॥ २॥
वाहनानि धनं चैव कवचान्यायुधानि च।
राज्यमात्मा वयं चैव कैतवेन हृतं परै:॥ ३॥ | | | | | | अनुवाद | | काशी नरेश ने जो धन दिया था, जो उत्तम पदार्थ वे हमारे लिए लाए थे, तथा अन्य राजाओं ने जो रत्न दिए थे, तथा हमारे वाहन, हमारे वैभव, हमारे कवच, हमारे अस्त्र-शस्त्र, हमारा राज्य, तुम्हारे शरीर और हम सब भाईयों को शत्रुओं ने जुए में हारकर अपने अधिकार में कर लिया है ॥2-3॥ | | | | The wealth that the King of Kashi had gifted and the other fine materials that he had brought for us, as well as the precious stones that other kings had presented to us, as well as our vehicles, our splendors, our armour, our weapons, our kingdom, your bodies and all of us brothers, were gambled away by the enemy and taken possession of. ॥2-3॥ | | ✨ ai-generated | | |
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