श्री महाभारत  »  पर्व 2: सभा पर्व  »  अध्याय 76: भीमसेनका क्रोध एवं अर्जुनका उन्हें शान्त करना, विकर्णकी धर्मसंगत बातका कर्णके द्वारा विरोध, द्रौपदीका चीरहरण एवं भगवान‍्द्वारा उसकी लज्जारक्षा तथा विदुरके द्वारा प्रह्लादका उदाहरण देकर सभासदोंको विरोधके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.76.17 
एवं स बहुश: सर्वानुक्तवांस्तान् सभासद:।
न च ते पृथिवीपालास्तमूचु: साध्वसाधु वा॥ १७॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार विकर्ण ने दरबार के सभी सदस्यों से बार-बार अनुरोध किया; परंतु उन राजाओं ने इस विषय में उसे कुछ भी भला-बुरा नहीं कहा।
 
In this manner Vikarna repeatedly requested all the members of the court; but those kings did not say anything good or bad to him on this matter.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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